व्यापार में घाटा, परीक्षा में असफलता, अकारण घबराहट से बचाता है यह महामन्त्र

ऐसा देखा जाता है कि कई छात्र तैयारी तो बहुत अच्छी किए रहते हैं, लेकिन ठीक परीक्षाके नजदीक आते ही उनकी घबराहट शुरू हो जाती है कि कहीं उनकी परीक्षा खराब न हो जाए, औऱ वे जानते हुए भी या तो उत्तर भूल जाते हैं या उसे गलत कर बैठते हैं।

कुछ व्यापारियों भी हरदम यही सोचते रहते हैं कि पता नहीं वे अपना कार्य सही ढंग से कर रहे हैं नहीं, और इस डर के कारण असफल होकर अपने भाग्य को ही कोसना शुरू कर कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते।

और, यह तो अक्सर देखा जाता है कि बहुत सारे लोग अकारण डरे- डरे से रहते हैं, जिसके फलस्वरूप अनेक प्रकार की शंकाओं, भयों आदि से ग्रस्त होकर लगभग कोई भी काम या तो करने से भागते हैं या कार्य प्रारम्भ करने के बाद उसे बीच में ही छोड़ देते हैं ।

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यद्यपि कि इससे मिलते जुलते विभिन्न प्रकार के उदाहरण हैं, जिसकी संख्या गिनवाना मेरा लक्ष्य नहीं है, अपितु मेरा ध्येय है कि इन भयंकर रोगों से ग्रसित मनुष्यों को छुटकारा कैसे मिले, जिससे कि वे अपनी जीवन नैया को सुचारु ढंग से पार लगाते हुए सुखी रह सकें।
श्रीदुर्गासप्तसती में इनके निवारण का सिद्ध उपाय वर्णित है –

एकबार श्री ब्रम्हा आदि देवगण ने माँ दुर्गा की अत्यंत श्रध्दा औऱ भक्ति से पूजा की। इससे मैया अति प्रसन्न होकर उन देवों को कहा – “मैं आपलोगों द्वारा इस प्रेमपूर्ण पूजन से बहुत आनन्दित हूँ, अतः आप लोग जो भी वरदान माँगेंगे उसे मैं अवश्य दूँगी ।”

यह सुनकर देवताओं ने पूरी विनम्रता से उत्तर दिया, ” हे जगतजननी, आपने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ सदृस दुष्ट दैत्यगण का संहार करके हमलोगों का इतना उपकार किया है कि अब अपने लिए कुछ माँगना शेष नहीं है, फिर भी जब आपका आदेश है तो कोई ऐसा उपाय बताईए कि इस संसारमें जो भयानक भयों से जकडे हुए मनुष्य असफलता की चक्की में पिस रहे हैं, वे इन दुःखों से त्राण पाकर जीवन निर्वाह कर सकें ।”

देवताओं की यह लोकोपकारी विनीत प्रार्थना सुनकर दयामयी माँ दुर्गा ने कहा,” देवगण ! सुनिए – ” मैं आपलोगों को ऐसा सिद्ध और दुर्लभ मन्त्र बताता हूँ जो निश्चित ही कल्याणकारी प्रभाव दिखाता है ।

यह मेरे बत्तीस नामों की माला है । ये यह इस प्रकार है –

दुर्गा दुर्गार्ति शमनी दुर्ग आपद् विनिवारिणी ।
दुर्गम्द् छेदिनी दुर्ग साधिनी दुर्ग नाशिनी ।।
दुर्गति उद्धारिणी दुर्ग निहन्त्री दुर्गमापहा ।
दुर्गम ज्ञानदा दुर्ग दैत्य लोक दवानला ।।
दुर्गमा दुर्गम आलोका दुर्गम आत्म स्वरूपिणि ।
दुर्ग मार्ग प्रदा दुर्गम विद्या दुर्गम आश्रिता ।।
दुर्गम ज्ञान संस्थाना दुर्गम ध्यान भासिनी ।
दुर्ग मोहा दुर्ग मगा दुर्गम अर्थ स्वरूपिणी ।।
दुर्गम असुर संहन्त्री दुर्गम आयुध धारिणी ।
दुर्गम आंगी दुर्ग मता दुर्गम्या दुर्गम ईश्वरी ।।
दुर्ग भीमा दुर्ग भामा दुर्गभा दुर्ग दारिणी ।
नामावलिम् इमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः ।।
पठेत् सर्व भयात् मुक्तो भविष्यति न संसयः ।।

आस्थावान पाठकों के लिए आवश्यक विच्छेद कर दिया गया है, जिससे कि संस्कृत नहीं जानने वाले भी सुविधापूर्वक इसे पढ सकें।

ध्यान यही देना है कि जहाँ-जहाँ से ” दु ” अक्षर आरम्भ होता है, वहीं से एक नाम प्रारम्भ होता है।

जो व्यक्ति पूजा करने के बाद या सोने से पहले इन नामों को पढेगा, उसका उपरोक्त कल्याण होकर रहेगा।

इति शुभम्

संकलन एवं संपादन: ज्योतिष विशेषज्ञ श्री सिद्धिनाथ.
(ज्योतिषीजी जी बिहार प्रसाशनिक सेवा से सेवा निवृत होने के बाद मानव कल्याण के लिए ज्योतिष परामर्श देते हैं. केवल अत्यंत जरुरी कार्य अथवा परेशानी के लिए संपर्क करें.)
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